Tuesday, 8 May 2012

बुधवार व्रत कथा .........(Wednesday fast STORY)


एक समय किसी नगर में एक बहुत ही धनवान साहुकार रहता था. साहुकार का विवाह नगर की सुन्दर और गुणवंती लड़की से हुआ था. एक बार वो अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन ससुराल गया और पत्नी के माता-पिता से विदा कराने के लिए कहा. माता-पिता बोले- बेटा आज बुधवार है. बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते. लेकिन वह नहीं माना और उसने वहम की बातों को न मानने की बात कही.
दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की. दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया. वहां से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की. रास्ते में पत्नी को प्यास लगी तो साहुकार उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद जब वो कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा, क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था. पत्नी भी साहुकार को देखकर हैरान रह गई. वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई. साहुकार ने उस व्यक्ति से पूछा- तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो. साहुकार की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- अरे भाई, यह मेरी पत्नी है. मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूं, लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?
साहुकार ने लगभग चीखते हुए कहा- तुम जरुर कोई चोर या ठग हो. यह मेरी पत्नी है. मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था. इस पर उस व्यक्ति ने कहा- अरे भाई, झूठ तो तुम बोल रहे हो. पत्नी को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था. मैं तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है. अब तुम चुपचाप यहां से चलते बनो नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा.
दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे. उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए. नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए. सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए. सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया. पत्नी भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी. राजा ने उन दोनों को कारागार में डाल देने को कहा. राजा के फैसले को सुनकर असली साहुकार भयभीत हो उठा. तभी आकाशवाणी हुई- साहुकार तूने माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया. यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है.
साहुकार ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए. मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई. भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा. साहुकार की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया. तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया. राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देखकर हैरान हो गए. भगवान बुधदेव् की अनुकम्पा से राजा ने साहुकार और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया.

कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई. बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था. दोनों उसमें बैठकर नगर की ओर चल दिए. साहुकार और उसकी पत्नी दोनों बुधवार का व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे. भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी. जल्द ही उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां भर गई. बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुष के जीवन में सभी मंगलकामनाएं पूरी होती है.... जय श्री राम...!

Thursday, 3 November 2011

माँ सरस्वती वन्दना


या कुन्देन्दु- तुषारहार- धवला या शुभ्र- वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना |
या ब्रह्माच्युत- शंकर- प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ||
शुक्लांब्रह्मविचारसारपरमा- माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् |
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ||

जय श्री राम............!!!

भोजन मंत्र


ॐ यन्तु नद्यो वर्शन्तु पर्जन्या, सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु,
अन्नावातम मोदान्न्वातम ममिक्षवातम, एषाम राजभुयाषम.
पर्मेस्ठिवा एषा यदोदनाह.
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षण, मास्वसारामुतास्वासा,
सम्येचासव्रता भूत्वा, वाचं वदत भद्रया.
परमामै वैयाम्श्रियम गमयति.
ब्रहमार्पणं ब्रहमहविर्‌ब्रहमाग्नौ ब्रहमणा हुतम् ।
ब्रहमैव तेन गन्तव्यं ब्रहमकर्मसमाधिना ॥
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु ।
मा विद्‌विषावहै ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:: ॥

जय श्री राम ..........!!!

Tuesday, 16 August 2011

ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी । यही सोचता हूँ की क्या बात होगी ॥


ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ।
यही सोचता हूँ की क्या बात होगी ॥
ये दिन ढल गया है व फैला अँधेरा ,
है यादों ने बनकर के तूफान घेरा ,
चमकने लगी बिजली आसमां में ,
है विश्वास अब सुख की बरसात होगी ॥
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ।
यही सोचता हूँ की क्या बात होगी..........॥
मैं बनकर के दीवाना गलियों में घूमा ,
चमकती बिजली के संग में भी खिल करके झूमा ,
मिले तू मुझे मैं गले से लगाऊं,
यही प्रेम की पुण्य सौगात होगी ॥
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ।
यही सोचता हूँ की क्या बात होगी..........॥
विरह की व्यथा में हुआ बे-सहारा,
की रो-रो तडपता है यह दिल हमारा
"साहिल"सिर्फ़ यादों के अब क्या बचा है ,
बिना अब न उनके मधुर रात होगी ॥
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ।
यही सोचता हूँ की क्या बात होगी..........॥
जुबां से न हमारी अब कोई बात होगी
तड़पते दिल के लिए ये अमृत की बरसात होगी
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ........
खामोश रहकर भी हमारी बात होगी.......
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी
ये ज़िन्दगी भर के लिए प्यार की एक सोगात होगी
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी.....
बस दिलों की दिलों से ही बात होगी.........
ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी ।
यही सोचता रहता हूँ की क्या बात होगी....॥
साहिल की कविताओं में सिर्फ मोहब्त की बात होगी
आंसुओं की अब ना आँखों से बरसात होगी

ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी..........
 ज़िन्दगी जब हमारी मुलाकात होगी............!!!!!!!!!!
love u zindagi..........

........***जय श्री कृष्ण***.........!

Thursday, 4 August 2011

रक्षाबन्धन


रक्षाबन्धन

हिन्दुओं के चार प्रमुख त्यौहारों में से रक्षाबन्धन का त्यौहार एक है,श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है,यह मुख्यत: भाई बहिन के स्नेह का त्यौहार है,इस दिन बहिन भाई के हाथ पर राखी बांधती है,और माथे पर तिलक लगाती है,भाई प्रतिज्ञा करता है,कि यथा शक्ति मै अपनी बहिन की रक्षा करूंगा। एक बार भगवान श्रीकृष्ण की कलाई में चोट लगने से रक्त बहने लगा,तो द्रोपदी ने अपनी साडी का पल्लू फ़ाड कर उनके हाथ में पट्टी बांध दी,इसी बन्धन से ऋणी होकर दु:शासन के द्वारा चीर हरण के समय उन्होने साडी का पल्लू बढा कर उनकी लाज बचाई थी,मध्यकालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है,जिसमें चित्तौड की रानी कर्मावती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूँ के पास राखी भेजकर अपना भाई बनाया था,हुमायूँ ने राखी की इज्जत रखी और उनकी रक्षा के लिये गुजरात के बादशाह से युद्ध किया था।

कथा

प्राचीनकाल में एक बार देवताओं और दानवों में बारह वर्ष तक घोर संग्राम चला,इस संग्राम में राक्षसों की जीत हुई और देवता हार गये,दैत्यराज ने तीनों लोकों के अपने वश में कर लिया,तथा अपने को भगवान घोषित कर दिया,दैत्यों के अत्याचारों से देवताओं के राजा इन्द्र ने देवताओं के गुरु बृहस्पति से विचार विमर्श किया,और रक्षा विधान करने को कहा,श्रावण पूर्णिमा को प्रात: काल रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया-"येन बद्धोबली राजा दान्वेन्द्रो महाबल:,तेन त्वामिभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल",उक्त मंत्रोचार से श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान किया,सह धर्मिणी इन्द्राणी के साथ वृत्र संहारक इन्द्र ने बृहस्पति की वाणी का अक्षरस: पालन किया,इन्द्राणी ने ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा स्वास्तिवाचन कराकर इन्द्र के दायें हाथ में रक्षा सूत्र बांध दिया,इसी सूत्र के बल पर इन्द्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की।
जय श्री राम............!

नागपंचमी वर्त कथा....मुकेश बिजल्वाण


श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी नाग पंचमी के नाम से विख्यात है,इस दिन नागों का पूजन किया जाता है सि दिन व्रत करके सांपों को दूध पिलाया जाता है,गरुड पुराण में ऐसा सुझाव दिया गया है कि नागपंचमी के दिन घर के दरवाजे के दोनो बगल में नाग की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाय,ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के मालिक नाग है,अर्थात शेषनाग आदि सर्पराजाओं का पूजन पंचमी को होना चाहिये।

कथा

प्राचीन दन्त कथाओं में अनेक कथायें प्रचलित है,उनमे से एक कथा इस प्रकार है- किसी राज्य में एक किसान रहता था,किसान के दो पुत्र व एक पुत्री थी,एक दिन हल चलाते समय सांप के तीन बच्चे कुचलकर मर गये,नागिन पहले तो विलाप करती रही फ़िर सन्तान के हत्यारे से बदला लेने के लिये चली,रात्रि में नागिन ने किसान उसकी पत्नी व दोनो पुत्रों को डस लिया,अगले दिन नागिन किसान की पुत्री को डसने के लिये पहुंची तो किसान की पुत्री ने नागिन के सामने दूध से भरा कटोरा रखा,और हाथ जोड कर क्षमा मांगने लगी,नागिन ने प्रसन्न होकर उसके माता पिता और दोनो भाइयों को जीवित कर दिया,उस दिन श्रावण शुक्ला पंचमी थी, तभी से नागों के प्रकोप से बचने के लिये इस दिन नागों की पूजा की जाती है।
जय श्री राम............!

Saturday, 9 July 2011

भगवान श्री कृष्ण जी की आठ पटरानियों के अतिरिक्त सोलह हजार रानियाँ भी थीं , क्या यह सत्य है और क्या श्री कृष्ण द्वारा ऐसा करना उचित था ?

आज हमारे एक मित्र ने  इस तरह का  प्रश्न किया...... तो हम तो इसका क्या उत्तर देते लेकिन हमें अपने गुरदेव से जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसके अनुसार यहाँ लिख रहे हैं जो कुछ भी भूल हो उसके लिए आप सभी से मुकेश बिजल्वाण छमा चाहता है......श्रीमद भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध, अध्याय ६९ , श्लोक ३३ से ४२ में वेद व्यास जी ने हजारों वर्ष पूर्व , इस प्रसंग का वर्णन पूरे विस्तार के साथ किया है ,इसके अनुसार :-
भगवान श्री कृष्ण ने विलासी राजा नरकासुर (भौमासुर) को मार कर जब उसके वैभवशाली महल में प्रवेश किया तो देखा कि भौमासुर ने देश के विभिन्न राज्यों से सोलह हजार राजकुमारियों को लाकर  बंदी बना रखा है  !
भौमासुर की मृत्यु के उपरांत इन राजकुमारियों को पुनः उनके अपने  परिवारों में लौट पाना असंभव लगा ! अस्तु , अन्तःपुर में पधारे ,नर श्रेष्ठ भगवान श्री कृष्ण को देखते ही उन्होंने उनसे अपने जीवन एवं मान सम्मान रक्षा के लिए प्रार्थना की !श्री कृष्ण की मनोहारी छवि के दर्शन से सबकी सब उनपर मोहित हो गयीं थीं यहाँ तक क़ी  उन्होंने उनकी अहेतुकी कृपा तथा अपना परम सौभाग्य मान कर ,मन ही मन उनको अपने प्रियतम पति के रूप में वरण भी कर लिया था !(श्लोक ३१,३२,३३) ! श्री कृष्ण ने भी उन कन्याओं की जीवन रक्षा के लिए  एवं समाज में उन्हें उचित सम्मान दिलाने के लिए स्वीकार कर लिया !
तदनन्तर भगवान श्री कृष्ण ने एक ही मुहूर्त में  विभिन्न महलों में , अलग अलग रूप धारण कर के ,एक ही साथ ,उन १६००० राजकुमारियों के साथ विधिवत विवाह (पाणिग्रहण) किया  ! सर्वशक्तिमान अविनाशी भगवान  के लिए इसमें आश्चर्य क़ी कौनसी बात है ?
जब   देवर्षि  नारद ने श्रीकृष्ण क़ी इन १६००० रानियों के विषय में जाना तो उन्हें वैसी ह़ी शंका हुई जैसी की मित्र आपको या अनेक लोगों को होती होगी! वे सोचने लगे कि यह कितने आश्चर्य की बात है क़ी श्रीकृष्ण एक ही शरीर से ,एक  ह़ी समय ,एक साथ इतनी कुमारियों से ब्याह रचा सके !अब द्वारका में १६१०८ रानियों के साथ उनका वैवाहिक जीवन कितना दुखद अथवा सुखद है यह जानने की उत्सुकता लिए नारदजी  भगवान कृष्ण की गृहस्थी का दर्शन करने स्वयं द्वारका पहुँच गये !
द्वारका में जो नारद जी ने देखा ,उससे उनकी आँखें खुली क़ी खुली रह गयीं !उन्होंने देखा कि भगवान श्री कृष्ण अपनी सभी रानियों के साथ गृहस्थों को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों  का आचरण कर रहे हैं !यद्यपि वह एक ह़ी थे पर नारदजी ने उन्हें उनकी प्रत्येक रानी के साथ अलग अलग देखा ! उन्होंने श्रीकृष्ण की योगमाया का परम ऐश्वर्य बार बार देखा और उनकी व्यापकता का अनुभव किया !यह सब देख सुन कर नारदजी के  विस्मय और कौतूहल की सीमा नहीं  रही !
रामावतार में मर्यादा का अत्याधिक पालन करने वाले भगवान ने जहाँ एक पत्नीव्रत धर्म का पालन किया था वहाँ कृष्णावतार में उन्होंने वैसा नहीं किया ! श्री कृष्ण जी ने १६१०८ देविओं से विधिपूर्वक विवाह किया !
कुछ विद्वानों का मत है कि ,गृहस्थाश्रम धर्म का वर्णन करने वालीं, वेद की १६००० ऋचाएं ,कृष्णावतार के समय , प्रभु सेवा की भावना से राजकुमारियां बनी और अंततः श्री कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हुईं !
भगवान श्रीकृष्ण जी के सम्बन्ध में जब हमने कुछ महात्माओं से पूछा तो उन्होंने सुझाव दिया कि मुकेश बिजल्वाण जी श्रीकृष्ण जी की महिमा को पूर्णतया माँ सरस्वती या वेद भी नहीं जानते फिर नर मनुष्यों की तो बात ही क्या है प्रिय पाठकों इसलिए बेहतर होगा की आप या हम श्रीमद भगवत गीता के दसवें अध्याय को पढ़ें...........क्यूंकि श्री कृष्ण भगवान जी के बारे में सिर्फ श्री कृष्ण जी ही बता सकते हैं और वो भी तब जब उन्हें अर्जुन जैसा शिष्य मिले........जय राधेगोविन्दा मित्रों........जय श्री राम..........!.......जय गोविंदा..!!!!!!!
भगवान श्रीकृष्ण जी के भक्तों की जय हो.................jsr